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मिस्वाक (दातुन) के फायदे
मिस्वाक के बेशुमार फ़ायदे
मिस्वाक (दातुन) के बेशक़ीमती फायदे के बारे में जानिए👌
✍ जावेद शाह खजराना (लेखक)
दोस्तों आपने मस्जिदों के वुजू-खाने में नमाजियों को लकड़ी की ब्रशनुमा छड़ी चबाते हुए जरुर देखा होगा?
दरअसल ये ब्रशनुमा लकड़ी रेगिस्तान में पैदा होने वाले पेड़ #पीलू या #मिस्वाक की टहनियां हैं।
मिसवाक के पेड़ को हिंदुस्तान में #पीलू से बख़ूबी जानते है। ये एक झाड़ीनुमा दरख़्त है जो बहुत तेजी से फैलता है। पीलू के वृक्ष बहुत टेढ़े-मेढ़े होते हैं । उन पर पीलुओं के बड़े-बड़े गुच्छे फलों के रूप में लगते हैं । इन वृक्ष पर दिसम्बर मास में फुल आते हैं और मार्च मास में फल पक जाते हैं ।
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| पीलू यानी मिस्वाक का पेड़ |
#पीलू से जुड़ी कुछ #रोचक जानकारी आपके साथ #शेयर कर रहा हूँ। पसंद आए तो आप भी जरूर शेयर करना ताकि नई पीढ़ी भी #नबी की सुन्नतों से वाकिफ़ हो जाए।
मिस्वाक के #पेड़ की सिर्फ टहनियां ही उपयोगी नहीं होती बल्कि इसके पत्तें, फल और छाल भी कई बीमारियों में काम आती है जैसे
पीलू के पत्ते, #वातनाशक, मूत्रजन्य (पथरी) एवं #क्षीरजनन हैं, जड़ तथा छाल भी अनेक रोगों के लिए लाभकारी है । चोट अथवा जख्म पर पीलू की छाल को बांध देने से आराम मिलता है ।
#बुखार की हालत में जब रोगी बुखार से तड़प रहा हो तो पीलू के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे #तीन-तीन घंटों के पश्चात् पिलाते रहें । बुखार जल्दी उतरेगा ।
#बवासीर के मरीजों के लिए #पीलू का रस बहुत ही #गुणकारी माना गया है क्योंकि यह रस मीठा होता है । लोग इसे बहुत खुश होकर पीते हैं । #बवासीर रोगियों को दिन में तीन बार इस रस का सेवन करना चाहिए ।
इसकी टहनियों की #दातून इस्लामी संस्कृति में बहुत मशहूर और आम चलन में है। मिस्वाक की लकड़ी में नमक और खास क़िस्म का #रेजिन पाया है जो दातों में चमक पैदा करता है। मिसवाक करने से जब इस की एक तह #दातों पर जम जाती है तो कीड़े आदि से दाँत मेहफ़ूज़ रहतें हैं। इस प्रकार #चिकित्सकीय नज़रिये से भी मिस्वाक दांतों के लिए बहुत फायदेमंद है।
क़रीब 7 हजार साल से मिस्वाक का इस्तेमाल हो रहा है।प्यारे नबी हजरत #मोहम्मद सल्लाहु अलैय वस्सलम भी मिसवाक का इस्तेमाल हमेशा करते थे। इसी वजह से मिसवाक करना सुन्नत भी है।
मिसवाक करने से दाँत तो मजबूत होते ही है साथ में पेट से सम्बंधित बीमारी भी दूर होती है। इसके आलावा मिस्वाक के इस्तेमाल से मुँह से ताजी हवा लिए खुश्बू के झोंके भी निकलते है। मिस्वाक एक बेहतरीन माउथ फ्रेशनर है जो मुँह की बदबू को दूर भगाता है।
यही वजह है कि हर नमाज में वुजू से पहले मिसवाक करते है।
मिस्वाक के इस्तेमाल करने से मुँह में दांत की सड़न कम करने वाली लार बनती है । जो दांतो को सड़ने से बचाती है। इसके साथ मिस्वाक इनामेल को मजबूत करने में मदद करता है, जिससे दांत सफेद रहते हैं।
हिंदुस्तान में टिहू के पेड़ के अलावा #नीम , #आम और #बबूल के पेड़ की टहनियों से भी #दातुन बनाते है। लेकिन सिर्फ़ मिसवाक और नीम ही ऐसे गिने चुने पेड़ है जिनकी दातुन सालभर इस्तेमाल कर सकते है।
बबूल और आम की दातुन #मौसम के हिसाब से इस्तेमाल करते है।
आपने मस्जिदों के वजुखाने में खुली पड़ी मिस्वाक देखी होगी। हमें किसी दूसरे की झूठी मिसवाक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
मिसवाक पुरानी होने पर उसे काटकर धूप में सुखाकर फिर इस्तेमाल कर सकते है। कोशिश करें कि मिसवाक को खुले में ना रखे । उसे प्लास्टिक के एक छोटे डिब्बे में रखे।
#कब्रस्तान और मस्जिद के सहन में टिहू यानि मिसवाक का पेड़ जरूर लगाएं।।
समय- समय पर उसकी कांटछांट करके दातुन बनाते रहे। ताकि झाड़ियां भी ना फैले और #मुस्लिम कौम को आसानी से मुफ़्त में ताजा-तरीन मिस्वाक (दातुन) मिल सके।
#जावेद_शाह_खजराना
बुधवार, 23 दिसंबर 2020
हजरत सैयद नाहरशाह वली की दरग़ाह - खजराना
इंदौर दिग्दर्शिका' पुस्तक में लेखक नगेन्द्र आज़ाद लिखते है कि नाहरशाह वली की दुआओं से मुगल बादशाह शाह आलम को सिंहासन प्राप्त हुआ था। लेखक जावेद शाह ने बताया कि मुगलों की बदहाली वजीरों की गद्दारी से शुरू हो चुकी थी ।
सन 1759 में हद हो गई जब वजीर ने अपने बादशाह आलमगीर को एक फ़क़ीर के हाथों मरवा दिया। बदनसीब आलमगीर की लाश लालकिले की खिड़की से यमुना नदी के किनारे फेंक दी। जहां हिंदुस्तान के शहंशाह की लाश बिल्कुल नंगी पड़ी रही, बाद में उसे अपने बाप-दादा हुमायूं के मकबरे में दफना दिया गया।
उस वक़्त आलमगीर का बेटा अली गौहर बिहार में था। अली गौहर ने "शाह आलम" की उपाधि धारण करके स्वयं को भारत का सम्राट घोषित किया ,लेकिन दिल्ली दूर थी।
खजराना स्थित हजरत सैयद नाहरशाह वली की दरग़ाह
खजराना में हजरत नाहरशाह वली के इंतकाल को करीब 60 साल गुजर चुके थे। हुसैन शाह वल्द सखी शाह खादिम थे। अली गौहर बादशाह बहुत दुविधा में फंसा था । अपने बाप की हत्या के बाद 12 साल तक दिल्ली की ओर बढ़ने की हिम्मत ना जुटा सका। पीर-फकीरों के दर पर दुआ की दरख़्वास्त लिए भटकता फिरता।
खजराना में बादशाह की अर्जी पहुंची , हुसैन शाह और उनके साथियों ने बादशाह के लिए नाहरशाह वली के आस्ताने पर दुआ की ।
अली गौहर बादशाह की किस्मत चमकी जनवरी 1772 में वो दिल्ली पहुंचा। जब तक शाह आलम बिहार में रहा अंग्रेजों के प्रभाव में था। यानी सन 1760 से 1772 तक का समय । इसी बीच शाह आलम ने बंगाल को वापस जितने की कोशिश की लेकिन सफल नही हुआ। 1764 में बक्सर की जंग में हारने के बाद मजबूर होकर बंगाल,बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को दे दी ,अंग्रेज शाह आलम की बहुत बेइज्जती करते थे फिर भी उसे बादशाह मानते ।
उस समय खजराना में नाहरशाह वली की दरगाह पर सबसे पहले खादिम और नाहरशाह के साथी हजरत सखी शाह के बेटे हुसैन शाह मुजावर थे । ज्यादा समय नही गुज़रा था । शाह आलम ने यहां के बुजुर्गों से भी दुआ करवाई थी । पीर -फकीरों की दुआ कुबूल हुई । 1772 में शाह आलम दिल्ली पहुंचा । 1779 में उसने अपनी परेशानियों को लेकर फिर पीर-फकीरों को याद किया और सम्मान में खजराना की दरगाह नाहरशाह वली के निवर्तमान खादिम और मुजावर हजरत हुसैन शाह को 50 बीघा जमीन हमेशा-हमेशा के वास्ते सनद लिखकर दी। गवाही में बुजुर्गों को लिया जिनके दस्तखत सनद पर हैं। इस सनद पर खजराना के उस दौर के पीर-फकीरों पर के दस्तखत है।
ये सनद फारसी में है जो मैंने पोस्ट पर दिखाई है। ओरिजनल सनद आज भी खजराना में रखी है जिसे कोर्ट से चुरा लिया गया था।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान में हाईकोर्ट में दरगाह का केस लंबित है । बदकिस्मती की बात है कि नाहरशाह वली के खादिम सुप्रीम कोर्ट से केस जितने के बाद भी दरगाह पर काबिज नही हो पाए। पिछले पच्चीस सालों से दरगाह पर वक़्फ़ बोर्ड का कब्जा है।
